जयपुर: राजस्थान हाई कोर्ट की जयपुर पीठ ने परिवहन उप निरीक्षक (Motor Vehicle Sub Inspector-MVSI) भर्ती को लेकर चल रहे लंबे विवाद पर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि जिन भर्ती नियमों में केवल डिप्लोमा को योग्यता माना गया है, वहां डिग्री धारकों को अपने आप योग्य नहीं माना जा सकता। अदालत ने साफ लफ्जों में कहा कि न्यायपालिका को भर्ती नियमों में अपनी तरफ से कोई नई या अतिरिक्त शैक्षणिक योग्यता जोड़ने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

हाई कोर्ट की खंडपीठ ने खारिज की अपीलें, भर्ती जल्द पूरी करने का आदेश

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बिपिन गुप्ता की खंडपीठ ने परिवहन उप निरीक्षक भर्ती से संबंधित दायर की गईं तमाम विशेष अपीलों पर एक साथ सुनवाई की। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सभी अपीलों को सिरे से खारिज कर दिया। इसके साथ ही माननीय कोर्ट ने राजस्थान सरकार को इस अटकी हुई भर्ती प्रक्रिया को बिना किसी देरी के जल्द से जल्द पूरा करने के कड़े निर्देश जारी किए हैं।

नियमों में 'न्यूनतम योग्यता' नहीं, सिर्फ 'डिप्लोमा' शब्द का है उल्लेख

हाई कोर्ट ने अपने निर्णय का आधार बताते हुए कहा कि इस विशेष भर्ती नियमों के शेड्यूल में परिवहन उप निरीक्षक पद के लिए कहीं भी 'न्यूनतम योग्यता' (Minimum Qualification) जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है। नियमों के मुताबिक, इस पद के लिए केवल ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग या मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा को ही एकमात्र पात्रता माना गया है। इसके अतिरिक्त केवल उसी अन्य योग्यता को मान्यता दी जा सकती है, जिसे केंद्र या राज्य सरकार ने आधिकारिक तौर पर इसके समकक्ष (Equivalent) घोषित किया हो।

नियम निर्माताओं ने जानबूझकर उच्च योग्यता को रखा बाहर

खंडपीठ ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि नियम बनाने वाले प्राधिकरण ने सोच-समझकर और जानबूझकर इस पद के लिए उच्च योग्यता या 'डिग्री धारक' शब्द को नियमों में शामिल नहीं किया था। यहाँ तक कि भर्ती समिति ने भी अपनी प्रक्रिया में डिप्लोमा और डिग्री को एक समान नहीं माना है। ऐसी स्थिति में अदालत नियमों के दायरे से बाहर जाकर कोई ऐसी पात्रता या शर्त नहीं जोड़ सकती, जो मूल नियमों का हिस्सा ही नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों और 'खेल के नियम' का दिया हवाला

अदालत ने अपने इस फैसले को मजबूत कानूनी आधार देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध 'जहूर अहमद मामले' का उदाहरण दिया। इसके तहत यदि कोई पद विशेष रूप से डिप्लोमा धारकों के लिए आरक्षित या निर्धारित है, तो उसका मुख्य उद्देश्य डिप्लोमा कर चुके अभ्यर्थियों को रोजगार के अवसर देना है, न कि उसमें डिग्री धारकों को शामिल करना।

इसके अलावा, अदालत ने 'तेज प्रकाश पाठक बनाम राजस्थान हाई कोर्ट' मामले का भी जिक्र किया, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि 'खेल शुरू होने के बाद खेल के नियम बदले नहीं जा सकते' (Rules of the Game cannot be changed after the game has started)। यानी एक बार भर्ती प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद बीच में योग्यता के नियमों में फेरबदल नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट के इस अंतिम फैसले के बाद अब राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड और परिवहन विभाग के लिए इस भर्ती को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है।